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गोटूल'' तत्वज्ञान
आदि महामानव पहांदी पारी कुपार लिंगो का ''गोटूल'' तत्वज्ञान

हमने पूर्व में "कोया पुनेम (गोंडी धर्म) सदमार्ग" पढ़ा है, इस कोया पुनेम तत्वज्ञान में (१) सगा (विभिन्न गोत्रज धारक समाज), (२) गोटूल (संस्कृति, शिक्षा केन्द्र), (३) पेनकड़ा (देव स्थल, ठाना), (४) पुनेम (धर्म) तथा (५) मुठवा (धर्म गुरु, गुरु मुखिया) यह पांच वंदनीय एवं पूज्यनीय धर्म तत्व हैं।

इनमे से किसी एक की कमी से कोया पुनेम अपूर्ण ही रह जाता है,
आदि महामानव पहांदी मुठवा पारी कुपार लिंगों ने अपने साक्षीकृत निर्मल सिद्ध बौद्धिक ज्ञान से सम्पूर्ण कोया वंशीय मानव समाज को सगायुक्त सामाजिक जीवन का मार्ग बताया।

सगायुक्त सामाजिक जीवन के लिए उचित एवं अनुकूल व्यक्तित्व,
नव वंश में निर्माण करने के उद्देश्य से पारी कुपार लिंगों ने "गोटूल" नामक शिक्षण संस्था की स्थापना की

गोटूल, यह संयुक्त गोंडी शब्द गो+टूल इन दो शब्दों के मेल से बना हुआ है ।

"गो" याने 'गोंगो' अर्थात दुःख एवं क्लेश निवारक शक्ति, जिसे विद्या कहा जाता है "टूल" याने ठीया, स्थान,स्थल इस तरह गोटूल का मतलब गोंगोठाना (विद्या स्थल, ज्ञान स्थल) होता है ।

प्राचीन काल में गोंडवाना के प्रत्येक ग्राम में जहां गोंड वहा गोटूल संस्था विद्दमान थी ।

फिर चाहे वह मूलनिवासियों में से किसी भी समुदाय के क्यों ना हो. गोटूल संस्था को विभिन्न प्रदेशों में विभीन संज्ञाओं से जाना जाता है ।

जैसे- भूंईंया गोंड इसे 'धंगर बस्सा' (धंगर याने विद्या, बस्सा याने स्थल), मुड़िया गोंड इसे 'गिती प्रोरा' (गिती याने ज्ञान, प्रोरा याने घर), और उराँव गोंड इसे 'दूम कुरिया' (दूम याने विद्या, कुरिया याने पढ़ाई का स्थान, घर) आदि ।

इस तरह गोटूल नामक शिक्षा संस्था की स्थापना कर उसमे छोटे बाल-बच्चों, उम्र के ३ से लेकर १८ वर्ष तक के लिए उचित शिक्षा प्रदान करने का कार्य पारी कुपार लिंगों ने शुरू किया ।

इस पर से पारी कुपार लिंगो के कोया पुनेम तत्वज्ञान में
बौद्धिक ज्ञान विकास को कितना अग्रक्रम में दिया गया है,
इस बात की जानकारी हमें प्राप्त होती है ।

गोंडवाना दर्शन में उल्लेख मिलता है कि माता रायतार जंगो के अनाथ आश्रम में माता रायतार जंगो और माता कली कंकाली के आश्रय, छत्रछाया में पल एवं बढ़ रहे मंडून्द (तैंतीस) कोट बच्चों को स्वभाव परिवर्तन, सुधार के लिए महादेव की आज्ञा से कोयली कचारगढ़ गुफा में बंद कर दिया गया था ।

गुफे के द्वार को एक बहुत बड़े चट्टान से बंद कर दिया गया था ।

यह चट्टान महादेव की संगीतमय मंत्र से पूरित था, इसे खोलने का उपाय केवल महादेव ही जानते थे ।

गुफे के शीर्ष में होल नुमा संकरा छिद्र था और आज भी है, जो पहाड़ में शीर्ष पर खुलता है ।

गुफे के अंदर से उन बच्चों का इस छिद्र के द्वार से निकल पाना संभव नही था ।

इसी छिद्र से उन बच्चों को माताओं के द्वारा भोजन पहुचाया जाता था ।

वर्षों तक बच्चे गुफा में ही बंद रहे, बच्चों के बिना माताओं (माता रायतार जंगो और माता कली कंकाली) का हाल बेहाल होने लगा ।

उनहोंने बच्चों को मुक्त करने के लिए महादेव से कई बार निवेदन किए, किन्तु महादेव ने उन्हें मुक्त करने में असमर्थता जताया ।

उधर बच्चों के बिना माता रायतार जंगो तथा माता कली कंकाली का मातृत्व ह्रदय और शरीर जीर्ण-क्षीण होने लगा था ।

माताओं की इस अवस्था को देखकर महादेव को दया भाव जागृत हुआ
और वे उन बच्चों को गुफा से मुक्त किए जाने का मार्ग बताया " इसे कोई महान संगीतज्ञ ही खोल सकता है,
जो दसों भुवनों और प्रकृति के चर-आचार, जीव-निर्जीव, तरल-ठोस सभी तत्वों की आवाज का ज्ञाता हो, संगीत विज्ञानी हो तथा उन आवाजो का लय बजा सकता हो या पूरी सृष्टि की लय जिसका संगीत हो ।

यह सुनकर माताओं के लिए दूसरी संकट खडी हो गई. महादेव ने ध्यान से आँखें खोलते हुए कहा- वह महामानव, संगीतज्ञ इस संसार में आ चुका है ।

केवल वही इस गुफा के द्वार का चट्टान अपनी संगीत विद्या की शक्ति से हटा सकता है ।

माताएं महादेव के बताए मार्ग अनुसार उसे ढूँढने निकल पड़ीं और 'हीरासूका पाटालीर' के रूप में उसे पाया ।
महादेव की आज्ञा से हीरासूका पाटालीर ने अपने संगीत साधना से महादेव के द्वारा गुफा के द्वार पर बंद की गई मंत्र साधित चट्टान को हटा दिया ।

चट्टान के हटने और लुड़कने से उसमे दबकर हीरासूका पाटालीर की मृत्यु हो गई ।

उस संगीत विज्ञानी का यहीं अंत हो गया, बच्चे गुफा से मुक्त हो गए ।

अब महादेव और माताओं को बच्चों की भविष्य की चिंता सताने लगी, सभी मंडून्द कोट बच्चे केवल मांस के लोथड़े भर थे, उन्हें किसी भी तरह का सांसारिक
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